Friday, May 13, 2011

अपनी योग्यता का १०० प्रतिशत प्रयास करे.

प्रश्न: लोगो को मुझ से बहुत अपेक्षाये है, इसके लिए मैं क्या करू ?

श्री श्री रवि शंकर: यह उनकी समस्या है, आप अपनी योग्यता का १०० प्रतिशत प्रयास करे, और उसके लिए जो भी कर सकते है, उसे करे , और फिर भी यदि कोई और अपेक्षा करे तो यह उनकी समस्या है( श्री श्री ने श्रोताओ से भगवत गीता को सीखने में उनके प्रगति के बारे में प्रश्न किया फिर श्रोताओ ने सातवें अध्याय के श्लोको का मंत्रोचारण किया, और श्री श्री ने उनके अर्थ पर प्रकाश डाला )जब कोई योगी निद्रा में होते है, तो हर कोई जागता है और जब हर कोई निद्रा में होते है, तो योगी जागते है यह बात भगवान श्री कृष्ण भगवत गीता में कही है क्या आपने इसे पहेले सुना है ? इसका क्या अर्थ है? इसका सरल अर्थ है, जब हर कोई उत्तेजित और चिंतित होता है,कि क्या होने वाला है तो योगी आरामपूर्वक विश्राम करते है योगी जानते हैं कि सबकुछ उत्तम और जन सामान्य के लिए अच्छा ही होगा योगी में यह विश्वास होता है और जब सब कोई निद्रा में होते है और योगी जागते है का अर्थ है, योगी जीवन के सत्य के बारे में सचेत होते हैं, जब हर कोई निद्रा में होते हैं यह कोई विचार नहीं करता कि उसका अंत क्या होगा, वह कहां पर जायेगा, जीवन क्या है, और मैं कौन हूं जब इनमे से कोई भी प्रश्न लोगो के मन में उत्पन्न नहीं होते है तो वे निद्रा में है लोग सिनेमा देखने मे और विडियो गेम खेलने मे लुप्त हो गए हैं ऐसे भी कई लोग हैं जो वृद्ध अवस्था मे विडियो गेम खेलने की शुरुवात करते हैं व्यक्ति यह नहीं देख रहा हैं कि मृत्यु निकट आ रही हैं वह यह सोचता ही नहीं हैं कि कैसे उसने अपने मन मे इतनी लालसा और घृणा को एकग्रित करके रखा हैं और वह अपने मन को साफ और स्वच्छ करने के लिए कुछ नहीं करता यदि आप इन मन के संस्कारो की सफाई नहीं करते हैं तो फिर आप को वही मन और संस्कार मृत्यु के बाद भी ढोने होंगे जब आप की मृत्यु होती हैं तो आपका मन खुश और आनंदमयी होना चाहिए जो कोई भी ऐसी निद्रा में होता है तो वह अपने भीतर मन में कचरा एकाग्रित कर रहा होता है परन्तु योगी सतर्क और सचेत होते हैं और वे अपने मन में किसी का भी बाहरी कचरा नहीं लेते उस आदमी ने मुझे ऐसा क्यों कहां ? उस महिला ने मुझे ऐसा क्यों कहां ?आपका मन पूरी तरह से दूसरों की त्रुटियों के बारे में सोचने मे नष्ट हो जाता है दूसरों की त्रुटियों को उनके पास ही रहने दीजिये उनसे उन्हें ही निपटने दीजिये आप अपने मन और त्रुटियों से निपटे, वही काफी है क्या आप मे दूसरों की गलतियों को स्वीकार करने का धैर्य है? आपको दूसरों की गलतियों को स्वीकार करना चाहिए और फिर आपसे जितना हो सके उन गलतियों को सुधारे यदि आप अत्यंत दयालु है, तो ही उसे सुधारे यद्यपि उसे प्रकृति पर छोड़ दीजिये, उन्हें अपना मार्ग मिल ही जायेगा परन्तु यदि आप करुणामय है, तो उसे करुणा के साथ सुधारे, फिर वह आपके मन या मस्तिष्क पर हावी नहीं होगा आप कब क्रोधित या उदास होते हैं ? जब आपने किसी के कृत्य मे त्रुटियों को देखा क्या आप इस तरह से किसी की त्रुटियों को ठीक कर सकते है ? उनके कृत्य मे त्रुटि थी परन्तु अब उसके बारे मे सोच कर आपका मन त्रुटिपूर्ण बन गया है कम से कम अपने मन को तो संभाल कर रखे यदि कोई गलत मार्ग पर चला गया है, तो क्यों आपका मन भी गलत मार्ग पर भटक जाना चाहिये ! ठीक है ? इसलिए वे कहते है कि और जब हर कोई निद्रा में होता है, तो योगी जागते है और जब आप ऐसी निद्रा में होते है तो आप अपने मन के भीतर दूसरों का कचरा एकाग्रित कर लेते है परन्तु योगी ऐसा नहीं होने देते वे अपने मन की ताज़गी बनाये रखते है

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