Wednesday, May 11, 2011

ज़टिल जीवन के बीच में मुस्कुराते मुस्कुराते गुज़र जाना बुद्धिमानी है।

प्रश्न: गुरुजी, शादी में इतने प्यार के बावज़ूद भी झगड़े क्यों होते हैं?

श्री श्री रवि शंकर: क्या कहें? हमे तो पता ही नहीं है! ना पता लगाने की चेष्टा करी मैने! हो सकता है कुछ जोड़ स्वर्ग में बनकर स्वर्ग से थक गएं हों, फ़िर नर्क में उतर आए हों, यां स्पेशल category में बने होंगे नर्क में।
देखो, हर संबंध में कभी न कभी, कुछ न कुछ, कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ भी होता है और ठीक भी होता है। तो हर परिस्तिथि में हम अपने मन को समझाएं, और थामे रहो तो सब चीज़े ठीक हो जाती हैं। देर सवेर सब ठीक हो जाता है। विलायत में अभी किसी देश में एक ब्यासी साल का पुरुष, ८० साल की अपनी पत्नि पर कोर्ट में केस कर दिया। डाइवोर्स ले लिया और केस कर दिया ८० साल के बाद। ४० साल साथ रहे, ४०-४५ साल दोनो। आखिरी में केस क्यों कर दिया? जिस कुर्सी पर वो बैठता था रोज़, पत्नि वो कुर्सि नहीं देना चाहती थी! नहीं छोड़ना चाहती थी। बाकी सब डिविज़न हो गया, कुर्सी की बात पर कोर्ट में इतना बड़ा केस हो गया! आदमी का दिमाग बहुत विचित्र है! जिस से दोस्ती करता है उसी से लड़ता है। और जिससे लड़ता है फ़िर उसी से दोस्ती की प्यास में पड़ा रहता है। तो यह जीवन बहुत ज़टिल है, और ज़टिल जीवन के बीच में मुस्कुराते मुस्कुराते गुज़र जाना बुद्धिमानी है। सिर्फ़ व्यक्ति को ही देखते रहोगे तो अज्ञान में रग जाओगे। व्यक्ति नहीं है व्यव्हार। व्यक्ति के पीछे जो चेतना है, सत्ता है, उसको देखो तो वो एक ही चेतना है - इस व्यक्ति से ऐसा कराया, उस व्यक्ति से वैसा कराया, उस व्यक्ति से वैसा कराया। इस तरह से व्यक्ति से पीछे जो चेतना जिस के कारण सब है और सब होता है, उसको पहचानना ज्ञान है। समझ में आया यह। हम सब को देखो तो हर व्यक्ति भीतर क्या है - Hollow and Empty. और जैसा विचार आया कुछ वैसा उन्होने व्यवहार कर दिया। उसका क्या कसूर है।

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