Wednesday, May 11, 2011

तथास्तु।

प्रश्न: हम हमारी सहनशीलता को कैसे बड़ा सकते हैं?


श्री श्री रवि शंकर: फ़िर वही बात! सहनशीलता मुझमें नहीं है जब मान के चलते हो तो वैसे हो जाएगा। हमारी दादी माँ कहा करती थी कभी कोई चीज़ नाकारात्मक नहीं बोलना। क्यों। कहती थी कुछ देवता घूमते रहते हैं उनका नाम है अस्तु देवता। वो बोलेंगे तुम कुछ कहोगे - तथास्तु। मानलो घर पर मिठाई नहीं है तो कभी नहीं कहती थी मिठाई नहीं है। कहती थी बाज़ार मिठाई से भरा हुआ है चलो बाज़ार चलते हैं। शब्दों में भी वो यह नहीं कहती थी कि मिठाई खत्म हो गई है। कहदोगे तो पता नहीं कहाँ अस्तु देवता घूम रहे होंगे तो तथास्तु कह देंगे। फ़िर खत्म ही रहेगा सब। इस तरह काजु चाहिए हमे, काजु भरा हुआ है बाज़ार चलते हैं! उस पीढ़ि के लोगों में कितना विश्वास था मन में। और यह बात सच भी है। वैज्ञानिक तौर से भी सही है। हम जिसको नहीं समझ के मानते है वैसा होता है। आभाव को मानोगे तो अभाव ही रहता है। कई लोग बोलते हैं पैसा नहीं है हमारे पास तो अस्तु देवता बोल देंगे तथास्तु ऐसे हो जाए। तो जिन्दगी भर वही नहीं नहीं गीत गाते चले जाते हैं। तो कभी भी तृप्ति नहीं होती। एक समृद्धि का अनुभव करो, महसूस करो। मेरे पास सब कुछ है। फ़िर तुम्हारे पास होने लगता है। मेरे पास नहीं है, मुझ में प्यार नहीं है - फ़िर ऐसा ही लगने लगता है। मैं बहुत प्यारा हूँ। समझ कर चलो तो प्यार ही प्यार मन में झलकता है।एक बड़े कंजूस व्यक्ति हमारे पास आए तो मैं बोलता हूँ तुम कितने उदार हो। तो एक बार हमारे पास आकर बोलते, "गुरुजी आप हमेशा बोलते हैं मैं उदार हूँ मैं उदार हूँ। मैं कहाँ उदार हूँ? मैं तो कितना कंजूस हूँ। मैं अपने पत्नि तक दस रूपय नहीं खर्चा करने देता हूँ। आप कैसे मुझे उदार बोलते हो? बच्चे जाते हैं काँगेस exibition में तो एक से दूसरी कैन्डी खरीद के देने में मुझे हिचकिचाहट होती है। मैं एक ही मिठाई खरीद के देता हूँ, और आप मुखे उदार बोलते हैं। ताकिं तुम उदर बन जाओ।तो जिस भावना को अपने में उभारना चाहते हैं, उसको मानके चलना पड़ता है वो है हमारे में। उसको नहीं है मानकर चलोगे तो नहीं है हो जाएगा। यह याद रखो, "काजु भरा है, बाज़ार चलते हैं!"

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